बाहर की दुनिया में आप चाहे जितनी यात्राएं कर लें, चाहे जितने पहाड़ों और वादियों में घूम आएं, लेकिन यदि आपके भीतर विचारों का कोलाहल शांत नहीं है, तो आपको दुनिया के किसी कोने में सुकून नहीं मिल सकता। आज का मानव एक अजीब सी विडंबना में जी रहा है। हमारे पास दूसरों की खबरों को जानने के लिए सोशल मीडिया के अनगिनत नोटिफिकेशन हैं, लेकिन खुद के भीतर क्या चल रहा है, यह जानने के लिए हमारे पास दो मिनट का भी समय नहीं है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक हमारा दिमाग लगातार सूचनाओं को सोख रहा है। विचारों की इस अत्यधिक भीड़ ने हमारे मन को एक अशांत बाजार बना दिया है। इस अशांति का समाधान किसी बाहरी मनोरंजन में नहीं, बल्कि अपने भीतर की जाने वाली ‘अंतर्यात्रा’ यानी ध्यान (Meditation) में है।
कई लोग समझते हैं कि ध्यान का मतलब किसी हिमालय की गुफा में जाकर बैठ जाना या संसार को छोड़ देना है। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। ध्यान का सीधा सा अर्थ है—अपने प्रति जागरूक होना। जब आप बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी विचार को सही या गलत कहे, केवल अपने मन में उठने वाले विचारों के प्रति एक दृष्टा (Observer) बन जाते हैं, तो उसे ध्यान कहते हैं। जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन आकाश उनसे अछूता रहता है, ठीक वैसे ही आपके मन में विचार आते-जाते रहेंगे, पर यदि आप उनसे नहीं जुड़ेंगे, तो आपके भीतर का सन्नाटा और सुकून कभी भंग नहीं होगा।
व्यस्त दिनचर्या के बीच ध्यान की शुरुआत करने का सबसे सरल तरीका है ‘आनापानसती योग’ या सांसों के प्रति सजगता। रोज़ सुबह या रात को सोने से पहले केवल दस मिनट के लिए रीढ़ की हड्डी को सीधा करके बैठ जाएं। अपनी आँखें बंद करें और अपनी आती-जाती हुई सामान्य सांसों को महसूस करें। जब सांस भीतर जाए, तो उसके प्रति जागरूक रहें; जब सांस बाहर आए, तो उसे महसूस करें। शुरुआती दिनों में आपका मन भटक कर पुरानी यादों या भविष्य की चिंताओं में भागेगा। यह पूरी तरह सामान्य है। मन को डांटना नहीं है, बस बहुत प्यार से उसे वापस अपनी सांसों पर ले आना है। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे कि विचारों की गति धीमी हो रही है और दो विचारों के बीच का जो खाली स्थान है, वहीं असली ‘मन का सुकून’ छिपा है।
सनातन अध्यात्म कहता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव ही आनंद और शांति है। चिंता और तनाव तो बाहर से ओढ़े गए रोग हैं। जब आप रोज़ ध्यान का अभ्यास करते हैं, तो आपकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है, आपका रक्तचाप नियंत्रित रहता है, और सबसे बड़ी बात—आप छोटी-छोटी बातों पर विचलित होना बंद कर देते हैं। आपके भीतर एक ऐसा ‘सुकून का द्वीप’ विकसित हो जाता है, जहाँ बाहर के किसी भी तूफान का कोई असर नहीं पड़ता।
‘दिव्य लेख’ (Divya Lekh) के माध्यम से हमारा उद्देश्य केवल शब्द लिखना नहीं है, बल्कि आपके जीवन में एक व्यावहारिक सकारात्मक बदलाव लाना है। हम चाहते हैं कि हमारे पाठक डिजिटल दुनिया के इस शोर से कुछ पल निकालकर अपने वास्तविक स्वरूप से जुड़ सकें। आज की रात सोने से पहले सिर्फ 5 मिनट अपनी आँखें बंद करके खुद के साथ बैठिए। किसी मोबाइल की स्क्रीन को नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति को निहारिए। आप पाएंगे कि जिस सुकून को आप पूरी दुनिया में ढूंढ रहे थे, वह तो सदा से आपके भीतर ही मौजूद था।
दिव्य लेख (Divya Lekh) अध्यात्म और योग डेस्क